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Chana ki Kheti: चना की फसल की सम्पूर्ण जानकारी पढ़िए

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Chana ki Kheti

Chana ki Kheti: चना रबी ऋतु ने उगायी जाने वाली महत्वपूर्ण दलहन फसल है | विश्व के कुल चना उत्पादन का 70 प्रतिशत भारत में होता है। चने में 24 प्रतिशत प्रोट 64.5 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट तथा 4.5 प्रतिशत वसा होती है। इसमें कैल्शियम, आयरन व नियासीन की अच्छी मात्रा होती है । चने का उपयोग इसके दाने व दाने से बनायी गयी दाल के रुप में खाने के लिये किया जाता है | इसके दाने को पीसकर बेसन बनाया जाता है, जिससे अनेक प्रकार के व्यंजन व मिठाईयां बनायी जाती है | हरी अवस्था में चने के दानों व पौधों का उपयोग सब्जी के रुप में किया जाता है। चने का भूसा चारे व दाना पशुओं के लिए पोषक आहार के रूप मे प्रयोग किया जाता है। चने का उपयोग औषधि के रूप में जैसे ख़न साफ करने के लिए व अन्य बीमारियों के लिए भी किया जाता है |

चना दलहनी फसल होने के कारण वातावरण से नाइट्रोजन एकत्र कर भूमि की उर्वरा शक्ति भी बढ़ाता है। देश में कुल उगायी जाने वाली दलहन फसलों का उत्पादन लगभग 7.00 मिलीयन टन प्रति वर्ष होता है | चने का उत्पादन कुल दलहन फसलों के उत्पादन का लगभग 45 प्रतिशत होता है। देश में चने का सबसे अधिक उत्पादन मध्य प्रदेश में होता है। जो कुल चने उत्पादन का 25.3 प्रतिशत पैदा करता है | इसके पश्चात्‌ आन्ध्र प्रदेश ((5.4 प्रतिशत), राजस्थान (9.7 प्रतिशत), कर्नाटक (9.6 प्रतिशत) तथा उत्तर प्रदेश (6.4 प्रतिशत) का स्थान आता है | राज्य में चने की औसत उपज (700 किग्रा. प्रति हैक्टेयर) अन्य राज्यों जैसे आन्ध्र प्रदेश ([440 कि.ग्रा.), गुजरात (970 कि.पग्रा.), कनार्टक (330 कि.पग्रा.) व महाराष्ट्र (870 कि.पग्रा.) की अपेक्षा काफी कम है| राज्य में चने की औसत उपज कम होने के अन्य कारणों के अतिरिक्त पारम्परिक विधियों द्वारा खेती करना भी प्रमुख कारण हैं। चने की खेती उन्नत विधियों द्वारा करने पर इसकी औसत उपज में दोगुनी से अधिक बढ़ोत्तरी की जा सकती है।

चने की फसल से अधिक उपज प्राप्त करने के लिए बहुत ही आवश्यक है चने की अनेक उन्नत किसमें

भूमि एवं उसकी तैयारी:

  • चने की खेती के लिए हल्की दोमट या दोमट मिट्टी
    अच्छी होती है|
  • भूमि में जल निकास की उपयुक्त व्यवस्था होनी चाहिये।
  • भूमि में अधिक क्षारीयता नहीं होनी चाहिये।
  • प्रथम जुताई मिट्टी पलटने वाले हल ५या डिस्क हैरो से करनी चाहिये |
  • इसके पश्चात्‌ एक क्रास जुताई हैरों से करके
    पाटा लगाकर भूमि समतल कर देनी चाहिये |
  • फसल को दीमक एवं कटवर्म के प्रकोप से बचाने के लिए अन्तिम जुताई के समय हैप्टाक्लोर (4 प्रतिशत) याक्यूंनालफॉस (.5 प्रतिशत) या मिथाइल पैराथियोन (2 प्रतिशत) या एन्डोसल्फॉन की (.5 प्रतिशत) चूर्ण की 25 कि.पग्रा. मात्रा को प्रति हैक्टेयर की |
  • दर से मिट्टी में अच्छी प्रकार मिला देनी चाहिये।

बीज उपचार

चने में अनेक प्रकार के कीट एवं बीमारियां हानि पहुँचाते हैं। इनके प्रकोप से फसल को बचाने के लिए बीज को उपचारित करके ही बुवाई करनी चाहिये। बीज को उपचारित करते समय ध्यान रखना चाहिये कि सर्वप्रथम उसे फफूंदनाशी, फिर कीटनाशी तथा अन्त में राजोबियम कल्चर सें उपचारित करें। जड़ गलन व उखटा रोग की रोकथाम के लिए बीज को कार्बेन्डाजिम या मैन्कोजेब या थाइरम की .5 से 2 ग्राम मात्रा द्वारा प्रति कि.पग्रा. बीज दर से उपचारित करें | दीमक एवं अन्य भूमिगत कीटों की रोकथाम हेतु

4 क्लोरोपाइरीफोस 20 ईसी या एन्डोसल्फान 35 ईसी की 8 मिलीलीटर मात्रा

प्रति किलो बीज दर से उपचारित करके बुवाई करनी चाहिये | अन्त में बीज को राइजोबियम कल्चर के तीन एवं फास्फोरस घुलनशील जीवाणु के तीन पैकेटों द्वारा एक हैक्टेयर क्षेत्र के लिए आवश्यक बीज की मात्रा को उपचारित करकेबुवाई करनी चाहिये | बीज को उपचारित करके लिए एक लीटर पानी में 250 ग्राम गुड़ को गर्म करके ठंडा होने पर उसमें राइजोबियम कल्चर व फास्फोरस घुलनशील जीवाणु को अच्छी प्रकार मिलाकर उसमें बीज उपचारित करना चाहिये | उपचारित बीज को छाया में सूखाकर शीघ्र बुवाई कर देनी चाहिये।

बोने का समय एवं बुवाई

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असिचिंत क्षेत्रों में चने की बुवाई अक्टूबर के प्रथम पखवाडे में कर देनी चाहिये |

जिन क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधा हो वहाँ पर बुवाई 30 अक्टूबर तक अवश्य कर देनी चाहिये। फसल से अधिक पैदावार प्राप्तकरने के लिए खेत में प्रति इकाई पौधों की उचित संख्या होना बहुत आवश्यक है। पौधों की उचित संख्या के लिए आवश्यक बीज दर व पंक्ति से पंक्ति एवं पौधे से पौधे की उचित दूरी की महत्वपूर्ण भूमिका होती हैं बारानी खेती के लिए 80 किग्रा. तथा सिंचित क्षेत्र के लिए 60 कि.ग्रा. बीज की मात्रा प्रति हैक्टेयर पर्याप्त होती है | बारानी फसल के लिए बीज की गहराई 7 से 40 से.मी. तथा सिंचित क्षेत्र के लिए बीज की बुवाई 5 से 7 से.मी. गहराई पर करनी चाहिये। फसल की बुवाई पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45 से 50 से.मी. पर करनी चाहिये।

खाद एवं उर्वरक

चने की फसल दलहनी होने के कारण इसकी नाइट्रोजन की कम आवश्यकता होती है क्‍योंकि चने के पौधों की जड़ों में ग्रन्थियां पाई जाती है। ग्रन्थियों में उपस्थित जीवाणु वातावरण की नाइट्रोजन का जड़ों में स्थिरीकरण करके पौधे की नाइट्रोजन की काफी मात्रा की आवश्यकता कीपूर्ति कर देती है | लेकिनप्रारम्भिक अवस्था में पौधे की जड़ो में ग्रंन्थियों का पूर्णविकास न होने के कारण पौधे को भूमि से नाइट्रोजन लेनी होती है। अतःनाइट्रोजन की आपूर्ति हेतु 20 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हैक्टेयर की आवश्यकता होती है। इसके साथ 40 कि.ग्रा. फॉस्फोरस प्रति हैक्टेयर की दर से देना चाहिये | नाइट्रोजन की मात्रा यूरिया या डाई अमोनियम फास्फेट (डीएपी) तथा गोबर खाद व कम्पोस्ट खाद द्वारा दी जा सकती है। जबकि फास्फोरस कीआपूर्ति सिंगल सुपर फास्फेट याडीएपी या गोबर व कम्पोस्ट खाद द्वारा की जा सकती है। एकीकृत पोषक प्रबन्धन विधि द्वारा पोषक तत्वों की आपूर्ति करना लाभदायक होता है। एक हैक्टेयर क्षेत्र के लिए 250 टन गोबर या कस्पोस्ट खाद को भूमि की तैयारी के समय अच्छी प्रकार से मिट्टी में मिला देनी चाहिये | बुवाई के समय 22 कि.ग्रा. यूरिया तथा 425 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट या 44 किग्रा. डीएपी में 5 किलो ग्राम यूरिया मिलाकर प्रति हैक्टेयर

सिंचाई

चने की अधिकतर खेती बारानी क्षेत्रों में संचित नमी में की जाती है। यदि सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो तो नमी की कमी होने की स्थिति में एक या दो सिंचाई की जा सकती है। पहली सिंचाई 40 से 50 दिनों बाद तथा दूसरी सिंचाई फलियां आने पर की जानी चाहिये। सिचिंत क्षेत्रों में चने की खेती के लिए 3 से 4 सिंचाई पर्याप्त होती है। बुवाई से पहले पलेवा करके फसल की # बुवाई करनी चाहिये | इसके पश्चात्‌ फसल की गुड़ाई करने के पश्चात्‌ बुवाई के 35-40 दिन बाद प्रथम, 70-80 दिन बाद दूसरी एवं 405-440 दिनों बाद अन्तिम सिंचाई करनी चाहिये। यदि बुवाई के बाद दो ही सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो तो प्रथम बुवाई के 40-50 दिनों बाद तथा द्वितीय 80-85 दिनों बाद करनी चाहिये। यदि बुवाई के बाद एक ही सिंचाई करने योग्य पानी उपलब्ध हो तो बुवाई के 60-65 दिनों बाद सिंचाई करने को प्राथमिकता देनी चाहिये। ध्यान रहे खेत में अधिक समय तक पानी भरा नहीं रहना चाहिये, इससे फसल के पौधों को नुकसान हो सकता है।

निराई -गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण

चने की फसल में अनेक प्रकार के खरपतवार जैसे बथुआ, खरतुआ, मोरवा, प्याजी, मोथा, दूब इत्यादि उगते है। ये खरपतवार फसल के पौधों के साथ पोषक तत्वों, नमी, स्थान एवं प्रकाश के लिए प्रतिस्पर्धा करके उपज को प्रभावित करते है। इसके अतिरिक्त खरपतवारों के द्वारा फसल में अनेक प्रकार की बीमारियों एवं कीटों का भी प्रकोप होता है जो बीज की गुणवत्ता को भी प्रभावित करते है | खरपतवारों द्वारा होने वाली हानि को रोकने के लिए समय ये नियंत्रण करना बहुत आवश्यक है। चने की फसल में दो बार गुड़ाई करना पर्याप्त होता है। प्रथम गुड़ाई फसल बुवाई के 30-35 दिन पश्चात्‌ व दूसरी 50-55 दिनों बाद करनी चाहिये । यदि मजदूरों की उपलब्धता न हो तो फसल बुवाई के तुरन्त पश्चात्‌ पैन्ड़ीमैथालीन की 2.50 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर खेत में समान रूप से मशीन द्वारा छिड़काव करना चाहिये | फिर बुवाई के 30-35 दिनों बाद एक गुड़ाई कर देनी चाहिये। इस प्रकार चने की फसल में खरपतवारों द्वारा होने


कीट एवं बीमारी नियंन्त्रण

चने की फसल में अनेक प्रकार के कीटों एवं बीमारियों का प्रकोप होता है जिनका उचित समय पर नियंत्रण करना बहुत
आवश्यक है।

वीमक, कटवर्म एवं वायर वर्म

यदि बुवाई से पहले एन्डोसल्फॉन, क्यूनालफोस या क्लोरोपाइरीफोस से भूमि को उपचारित किया गया है तथा बीज को क्लोरोपाइरीफोस कीटनाशी द्वारा उपचारित किया गया है तो भूमिगत कीटों द्वारा होने वाली हानि की रोकथाम की जा सकती है। यदि खड़ी फसल में दीमक का प्रकोप हो तो क्लोरोपाइरीफोस 20 ईसी या एन्डोसल्फान 35 ईसी की 2 से 3 लीटर मात्रा को प्रति हैक्टेयर की दर से सिंचाई के साथ देनी चाहिये। ध्यान रहे दीमक के नियन्त्रण हेतु कीटनाशी का जड़ों तक पहुचैंना बहुत आवश्यक है| कटवर्म की लटें ढेलों के नीचे छिपी होती है तथा रात में पौधों का जड़ों के पास काटकर फसल को नुकसान पहुँचाती है। कटवर्म के नियंत्रण हेतु मिथाइल पैराथियोन 2 प्रतिशत या क्यूनालफोस .50 प्रतिशत या एन्डोसल्फॉन्‌ 4 प्रतिशत चूर्ण की 25 किलोग्राम मात्रा को प्रति हैक्टेयर की दर से भुरकाव शाम के समय करना चाहिये। ट्राईक्लोरोफॉन 5 प्रतिशत चूर्ण की 25 किग्रा. मात्रा को भी प्रति हैक्टेयर की दर से भुरकाव किया जा सकता है।

फली छेदक

  • यह कीट प्रारम्भिक अवस्था में पत्तियों को खाकर फसल को हानि पहुँचाता है।
  • फली आने पर उसमें छेद बनाकर अन्दर घुस जाता है तथा दाने को खाकर फली को खोखला बना देता है|
  • इस कीट के नियंत्रण हेतु फसल में फूल आने से पहले तथा फली लगने के बाद एन्डोसल्फॉन 4 प्रतिशत या क्यूनालफॉस 4.5 प्रतिशत या मिथाइल पैराथियोन 2 प्रतिशत चूर्ण की 20-25 किग्रा. मात्रा को प्रति हैक्टेयर की दर से भुरकनी चाहिये |
  • पानी की उपलब्धता होने पर मोनोक्रोटोफॉस 35 ईसी या क्यूनॉलफोस 25 ईसी की 4.25 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टेयर की दर से फसल में फूल आने के समय छिड़काव करना चाहिये।

झ्ुलसा रोग (ब्लाइट)

  • यह बीमारी एक फफूंद के कारण होती है।
  • इस बीमारी के कारण पौधें की जड़ों को छोड़कर तने, पत्तियों एवं फलियों पर छोटे गोल तथा भूरे रंग के धब्बे बन जाते है |
  • पौधे की आरम्भिक अवस्था में जमीन के पास |
  • तने पर इसके लक्षण स्पष्ट रूप से दिखाई देते है।
  • पहले प्रभावित पौधे पीले व फिर भूरे रंग के हो जाते है तथा अन्ततः पौधा सूखकर मर जाता है |
  • इस रोग के लक्षण दिखाई देने पर मैन्कोजेब नामक फफूंदनाशी की एक किग्ग्रा. या घुलनशील गन्धक की एक कि.ग्रा. या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड की 4.30 किग्रा. मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिये |
  • 40 दिनोंके अन्तर पर 3-4 छिड़काव करने पर्याप्त होते है।

उसख्बटा रोग (विल्ट)

  • इस बीमारी के लक्षण जल्दी बुवाई की गयी फसल में बुवाई के 20-25 दिनों बाद स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगते है।
  • देरी से बोई गयी फसल में रोग के लक्षण फरवरी व मार्च में दिखाई देते है।
  • पहले प्रभावित कर पौधे पीले रंग के हो जाते है तथा नीचे से ऊपर की ओर पत्तियाँ सूखने लगती है।
  • अन्ततः पौधा सूखकर मर जाता है। इस रोग के नियन्त्रण हेतु भूमि में नमी की कमी नही होनी चाहिये |
  • यदि सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो तो बीमारी के लक्षण दिखाई देते ही सिंचाई कर देनी चाहिये।
  • रोग रोधी किस्मों जैसै आरएसजी 888, सी 235 तथा बीजी 256 की बुवाई करनी चाहिये।

‘किट्‌ट (रस्ट)

  • इस बीमारी के लक्षण फरवरी व मार्च में दिखाई देते है।
  • पत्तियों की ऊपरी सतह पर, फलियों पर्णवृतों तथा टहनियों पर हल्के भूरे काले रंग के उभरे हुए चकत्ते बन जाते है।
  • इस रोग के लक्षण दिखाई देने पर मेन्कोजेब नामक फफूंदनाशी की एक किग्रा. या घुलनशील गन्धक की एक किग्रा. या कॉपर ऑकक्‍्सीक्लोराइड की 4.30 किग्रा. मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिये |
  • 40 दिनों के अन्तर पर 3-4 छिड़काव करने पर्याप्त होते है।

पाले से फसल का बचाव

  • चने की फसल में पाले के प्रभाव के कारण काफी क्षति हो जाती है।
  • पाले के पड़ने की संम्भावना दिसम्बर-जनवरी में अधिक होती है |
  • पाले के प्रभाव से फसल को बचाने के लिए फसल में गन्धक के तेजाब की 0. प्रतिशत मात्रा यानि एक लीटर गन्धक के तेजाब को 4000 लीटर पानी
    में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिये।
  • पाला पड़ने की सम्भावना होने पर खेत के चारों और धुआं करना भी लाभदायक रहता है।

फसल चक्र

भूमि की उर्वरा शक्ति बनाये रखने एवं फसल से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए उचित फसल चक्र की विशेष भूमिका होती है। असिंचित क्षेत्र में पड़त चना (एक वर्षीय), पड़त-चना-पड़त-सरसों (द्विवर्षीय), तथा पड़त-चना-पड़त-सरसों-पड़त-चना (तीन वर्षीय) फसल चक्र अपनाये जा सकते है।

बीज उत्पादन

किसान चने के बीज का उत्पादन अपने खेत पर आसानी से कर सकता है। चने के बीज उत्पादन के लिए ऐसे खेत का चुनाव करना चाहिये जिसमें पिछले वर्ष चने की फसल न उगायी गई हो। खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिये तथा खेत के चारों ओर 40 से 20 मीटर की दूरी तक चने की फसल न उगायी गई हो अच्छी प्रकार से तैयार किये गये खेत में फसल की बुवाई उचित समय पर करनी चाहिये। भूमि में |

  • खरपतवार नहीं रहने चाहिये तथा पाटा लगाकर भूमि समतल कर देनी चाहिये |
  • प्रमाणित बीज या आधार बीज की बुवाई पंक्तियों में कर देनी चाहिये।
  • बुवाई से पहले खेत में उचित मात्रा में खाद एवं उर्वरकों का उपयोग करना चाहिये |
  • खेत में समय समय पर सिंचाई करनी चाहिये तथा खरपतवार, कीट एवं बीमारियों का समय पर नियंत्रण करना चाहिये।
  • खेत में अवांछनीय एवं रोगग्रस्त पौधों को फूल आने से पहले निकाल देना चाहिये |
  • फूल आने के बाद पौधों को रंग एवं आकार तथा पौधों में शाखाओं के आधार पर, पकने की अवस्था में फलियों के गुणों जैसे लम्बाई, रंग इत्यादि के आधार पर पहचान कर


जब फसल पूरी तरह पक जाये अर्थात्‌ फलियाँ पीली पड़ जाये व दाने कड़े हो जाये तो खेत के चारों ओर 5 से 40 मीटर खेत छोड़कर फसल की कटाई कर लेनी चाहिये

  • काटी गई फसल को अच्छी तरह से साफ किये गये खलिहान मे अलग से सुखाना चाहिये।
  • जब फसल अच्छी प्रकार से सूख जाये तो फसल को श्रेशर द्वारा या डंडे से पीट कर दाने को भूसे से अलग कर देना चाहिये |
  • दानों को साफ करके अच्छी प्रकार से सूखाकर जब नमी 8 से 9 प्रतिशत रह जाये तो स्वस्थ एवं अच्छे आकर के दानों का ग्रेडिंग कर लेना चाहिये |
  • ग्रेडिंग किये गये दानों को कीटनाशक जैसे एल्यूमिनियम फास्फाइड की गोली या ईडीबी एम्प्यूल को तोड़ कर या मैलाथियोन 5 प्रतिशत चूर्ण या फेनवलरेट चूर्ण की 250 ग्राम प्रति क्विंटल की दर से मिलाकर धातु की कोठी, पक्की कोठी या पूसा कोठी में भरकर अच्छी प्रकार से बन्द करके सुरक्षित स्थान पर रखकर भण्डारित करना चाहिये या मैलाथियोन या डेकामैश्रिन के एक प्रतिशत घोल से उपचारित नई बोरियों में सुरक्षित स्थान पर रखकर भण्डारित करना चाहिये। इस प्रकार से उत्पादित बीज को किसान अगले वर्ष | बुवाई के लिए प्रयोग कर सकते है।

फसल की कटाई एवं गहाई

फसल जब अच्छी प्रकार पक जाये तो कटाई करनी चाहिये जब पत्तियाँ व फलियाँ पीली व भूरे रंग की हो जाये तथा पत्तियाँ गिरने लगे एवं दाने सख्त हो जाये तो फसल की कटाई कर लेनी चाहिये। कटाई की गई फसल जब अच्छी प्रकार सूख जाये तो थ्रेशर द्वारा दाने को भूसे से अलग कर लेना चाहिये तथा अच्छी प्रकार सुखाकर सुरक्षित स्थान पर भण्डारित कर लेना चाहिये।

उपज एवं आर्थिक लाभ

उन्‍नत तकनीकियों का प्रयोग कर उगायी गयी फसल द्वारा 20 से 22 क्विंटल उपज प्रति हैक्टेयर प्राप्त की जा सकती है। चने की एक हैक्टेयर क्षेत्र में फसल उगाने के लिए लगभग 45-20 हजार का खर्च आता है। यदि चने का बाजार भाव 3000 रूपये प्रति क्विंटल हो तो प्रति हैक्टेयर लगभग 25-30 हजार रूपये का शुद्ध लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

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