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Tuesday, February 7, 2023
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एक पाकिस्तान में और एक म.प्र. बाड़ी में स्थित है देवी हिंगलाज मंदिर 51 शक्ति पीठो में से एक, जाने इसके चमत्कार

Hinglaj Devi Mandir : 52 शक्तिपीठों में हिंगलाज माता भी शामिल हैं। हिंगलाज मंदिर यूं तो बलूचिस्तान (पाकिस्तान) में है, पर अगर आप अपने देश में भी मां हिंगलाज का दर्शन करना चाहते हैं, तो मध्यप्रदेश के रायसेन जिले के बाड़ी नगर में आ सकते हैं। यहां हिंगलाज शक्तिपीठ की उपशक्तिपीठ है। 500 सालों से अनवरत जल रही घी और तेल की दो जोत (ज्योति) इस पीठ की महिमा को चारों ओर फैला रही हैं। ये ज्योति बलूचिस्तान स्थित हिंगलाज मंदिर से लाई गई थी। हिंगलाज मां के चमत्कार के आगे भोपाल रियासत की बेगम कुदसिया भी नतमस्तक हो गई थीं और बदले में जागीर दे दी थी।

Hinglaj Devi Mandir

मंदिर ट्रस्ट की ओर से पूजा-पाठ करने वाले आचार्य देवनारायण त्रिपाठी के मुताबिक मां हिंगलाज मंदिर, बाड़ी का इतिहास 500 साल पुराना है। 16वीं सदी में खाकी अखाड़ा की महंत परंपरा के चौथी पीढ़ी के महंत भगवानदास महाराज मां हिंगलाज को अग्नि स्वरूप में लेकर आए थे। इस यात्रा की रोचक कहानी सोरोजी के पण्डा प्रेमनारायण के द्वारा लिखित रचना ‘पण्डावही’ में मिलती है।

दरअसल, खाकी अखाड़े के महंत सोरोजी की तीर्थयात्रा पर जाते रहे हैं। ‘पण्डावही’ में लिखा है कि महंत भगवानदास महाराज भगवान राम और मां दुर्गा के अनन्य भक्त थे। 16वीं सदी में उनके मन में मां हिंगलाज देवी के दर्शन करने की इच्छा हुई। उस समय आवागमन के साधन तो थे नहीं, ऐसे में वे अपने दो शिष्यों के साथ पैदल ही हिंगलाज मंदिर का दर्शन करने निकल पड़े।

2 साल पदयात्रा… कंदमूल खाए, ज्योत लाकर बाड़ी में की स्थापना

मां हिंगलाज के दर्शन के लिए भगवानदास 2 साल तक पदयात्रा पर रहे। यात्रा के दौरान ही वे संग्रहणी-रोग (पाचन संबंधी समस्या) से पीड़ित हो गए। मां के दर्शनों की लालसा में पदयात्रा जारी रही। यात्रा के दौरान एक दिन महंत थक कर बैठ गए। शरीर में आगे चलने की शक्ति तक नहीं बची थी। वे मां से प्रार्थना करने लगे कि हे मां आपके दर्शन के बिना मैं नहीं लौटूंगा, चाहे मुझे प्राण ही क्यों न त्यागना पड़े…। अस्वस्थता की स्थिति में भी महीने भर तक कंदमूल खाकर यात्रा जारी रखी। जंगली रास्तों के चलते वे साथ में धूनी (अग्नि) लेकर चलते रहे। फिर यहां लाकर ज्योत स्थापित की।

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भोपाल रियासत की बेगम कुदसिया भी देख चुकी हैं मां का चमत्कार

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मां हिंगलाज के चमत्कारों की घटनाएं तो कई हैं, पर एक का संबंध भोपाल रियासत की पहली महिला शासक बेगम कुदसिया से जुड़ा है। आचार्य देवनारायण त्रिपाठी के मुताबिक साल 1820-25 के आसपास बेगम कुदसिया का बाड़ी में कैम्प लगा था। यहां से मां हिंगलाज का मंदिर थोड़ी दूरी पर था। खाकी अखाड़ा में 50-60 साधु स्थाई रूप से रहते थे। मंदिर में सुबह-शाम शंख, घंटा सहित अन्य वाद्य यंत्रों के साथ आरती होती थी। इसकी आवाज दूर तक जाती थी। बेगम कुदसिया इन आवाजों पर क्रोधित हो गईं। महंत को आदेश भिजवाया कि जब तक बाड़ी में हमारा कैम्प है, शोर नहीं होना चाहिए। हमारी नमाज में खलल पड़ता है।

बेगम ने थाल में मांस रखवा भोग लगाने के लिए मंदिर भेज दिया

महंत ने आदेश मानने से मना कर दिया। संदेश भिजवाया कि मैया की आरती इसी प्रकार होती है, भले ही उसका परिणाम कुछ भी हो। महंत के इनकार से बेगम नाराज तो हुईं, लेकिन महंत की साधना और चमत्कार के बारे में बहुत सुन रखा था। परीक्षा लेने के लिए उन्होंने मांस को कपड़े से ढंककर एक थाल में चार सेवकों के साथ भोग लगाने मंदिर भेज दिया। बेगम के सेवकों के आने की बात सुनकर महंत समझ गए। अपने एक शिष्य को भेजकर उन सेवकों को मुख्य द्वार पर रुकवा दिया। एक शिष्य को आज्ञा देकर भेजा कि अखंड धूनी के पास रखे कमंडल का जल थाल पर छिड़क दो और बेगम के सेवकों से कह दो कि भोग लग गया है। बेगम के सामने ही थाल से कपड़े को हटाना।

मां के चमत्कार से मांस के टुकड़े मिठाई में बदल गए

थाल लेकर सेवक बेगम के पास पहुंचे और सारा किस्सा कह सुनाया। बेगम ने थाल से कपड़ा हटाया, तो उसमें प्रसाद स्वरूप विभिन्न प्रकार की मिठाइयां मिलीं। बेगम आश्चर्य में पड़ गईं और अपनी गलती की माफी मांगने महंत से मिलने मंदिर जा पहुंचीं। इसके बाद बेगम ने मंदिर के नाम जागीर दान कर दी। इस जगह पर 65 एकड़ का बगीचा है। साल 2005 से मां हिंगलाज मंदिर शक्ति पीठ एक ट्रस्ट के रूप में संचालित हो रहा है।

राजस्थान और गुजरात तक से आते हैं श्रद्धालु

हिंगलाज माता काठियावाड़ राजवंश की कुलदेवी हैं। मप्र के छिंदवाड़ा में भी हिंगलाज माता का मंदिर बना है। बड़ी संख्या में यहां के लोग बाड़ी स्थित माता के दर्शन करने आते हैं। इसके अलावा गुजरात और राजस्थान से भी श्रद्धालु इस मंदिर का दर्शन करने आते हैं।

मां हिंगलाज मंदिर का निर्माण 18वीं सदी में हुआ था। मंदिर का शिखर गौड़ शैली का बना है। मां की प्रतिमा जगदम्बे की 51वीं उप शक्तिपीठ के रूप में स्थापित है। साल 2005 में ट्रस्ट की ओर से मां हिंगलाज मंदिर और श्री राम जानकी मंदिर पुनर्निर्माण कराया गया।

मंदिर के आसपास ये दर्शनीय स्थल भी हैं

  • मां हिगलाज मंदिर से कुछ ही दूरी पर श्री राम जानकी मंदिर है। यहां देवी-देवताओं की अष्टधातु से निर्मित प्रतिमाएं हैं।
  • मंदिर से नीचे की ओर आते ही भगवान गणेश का मंदिर है।
  • श्री गणेश मंदिर से कुछ ही दूरी पर शिवालय है।
  • शिवालय के सामने की ओर श्री हनुमान मंदिर है।
  • मां हिंगलाज मंदिर से लगभग 2 किमी की दूरी पर श्री भूतेश्वर धाम भोलेनाथ का मंदिर है।

मंदिर परिसर में होती है वेद-पुराण की पढ़ाई

मां हिंगलाज बाड़ी मंदिर परिसर में एक आवासीय संस्कृत विद्यालय भी है। जहां छात्रों को वेद-पुराण की शिक्षा दी जाती है। आचार्य त्रिपाठी के मुताबिक मां हिंगलाज संस्कृत उच्चतर माध्यमिक विद्यालय नाम से संचालित इस विद्यालय में प्रथमा से लेकर उत्तर मध्यमा द्वितीय वर्ष तक की पढ़ाई होती है। वर्तमान में यहां 150 बच्चे वेद व्याकरण, ज्योतिष, कर्मकांड की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। मंदिर परिसर में पूजा-पाठ और धार्मिक कर्मकांड की पूरी व्यवस्था यहां के बच्चे ही संभालते हैं।

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कैसे पहुंचा जाए…

मां हिंगलाज शक्ति पीठ बारना नदी के उत्तर तट पर खाकी अखाड़ा के सिद्ध महंतों की तपस्थली के समीप है। बारना, नर्मदा की सहायक नदी है। नर्मदा पुराण में भी इसका उल्लेख है। भोपाल-जबलपुर फोरलेन स्थित बाड़ी, रायसेन जिले में आता है। भोपाल से बाड़ी की दूरी लगभग 100 किमी है। बाड़ी नगर पंचायत से 2 किमी की दूरी पर मां हिंगलाज का मंदिर है। नवरात्र में पूरे समय यहां मेला भरता है। सामान्य दिनों में हर अष्टमी, मंगलवार और शनिवार को यहां दूर-दूर से लोग दर्शन को पहुंचते हैं।

बलूचिस्तान स्थित हिंगलाज मंदिर की महिमा भी जानिए…

मां हिंगलाज शक्तिपीठ बलूचिस्तान (पाकिस्तान) में है। मान्यता है कि यहां मां सती का शीश गिरा था। हिंगलाज का अर्थ है- सबको तत्काल फल देने वाली मां। हिंग का अर्थ है रौद्र रूप और लाज का अर्थ है लज्जा। कथा है कि गुस्से में शिव के सीने पर पैर रखने के बाद मां शक्ति लज्जित हुई थीं, इसलिए रौद्र और लज्जा को मिलाकर मां का नाम हिंगलाज पड़ा।

भगवान परशुराम ने जब 21 बार क्षत्रियों का अंत किया, तब बचे हुए क्षत्रिय मां हिंगलाज की शरण में गए और अपनी रक्षा के लिए अभय दान लिया। तब माता ने क्षत्रियों को ब्रह्मक्षत्रिय बना दिया। रावण के वध के बाद ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति के लिए भगवान राम ने भी माता हिंगलाज के दर्शन किए थे। उन्होंने यहां एक यज्ञ भी किया था। वर्तमान में मां हिंगलाज महारानी का मंदिर पाकिस्तान में नानी पीर के नाम से मशहूर है। 52 शक्तिपीठों में से एक मां हिंगलाज के इस मंदिर की देखभाल वहां के मुसलमान करते हैं।

52 शक्तिपीठों की ये है कथा

52 शक्तिपीठों की कथा भगवान शिव की पत्नी सती से जुड़ी हुई है। इस कथा के अनुसार अपने पिता के द्वारा शिव का अपमान होने पर सती ने यज्ञ कुंड में कूद कर जान दे दी थी। इस पर नाराज शिव सती का शरीर लेकर सारे लोकों को तहस-नहस करने निकल पड़े। उनका गुस्सा शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने सती के 51 टुकड़े कर दिए। जिन स्थानों पर सती के अंग गिरे, वे शक्तिपीठ कहलाए।

मान्यता है कि सती का सिर हिंगोल नदी के किनारे हिंगलाज में गिरा था, इसीलिए ये सबसे प्रमुख शक्ति पीठ है। हिंगलाज देवी को पांडवों और क्षत्रियों की कुल देवी के रूप में भी जाना जाता है। हर साल यहां 22 अप्रैल से हिंगलाज तीर्थ यात्रा होती है, इसमें भारत से भी गिने-चुने तीर्थ यात्री पहुंचते हैं। तीर्थ यात्रा के पहले चरण में श्रद्धालु 300 फीट ऊंचे ज्वालामुखी शिखर पर चंद्र गूप ताल के दर्शन करते हैं। चंद्र गूप ताल की भभूत लेने के बाद श्रद्धालु ज्वालामुखी शिखर से नीचे उतर कर, 35 किमी दूर किर्थार पहाड़ों की तलहटी में स्थित मुख्य हिंगलाज देवी मंदिर के दर्शन करते हैं।

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