Makar Sankranti 2024: इस शहर होता है पालन तिलकट रिवाज का, बेटो की रहती है प्रधानता, जानिए

By Saurabh

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Makar Sankranti Tradition: मकर संक्रांति पर कुल देवता को तिल, गुड़ और चावल चढ़ाने के बाद वह प्रसाद माताएं अपनी बेटिओ की वजाह अपने बेटों के हाथ में देती है और उनसे बुढ़ापे में उनका सहारा बनने का वचन लेती है.

Makar Sankranti 2024: इस शहर होता है पालन तिलकट रिवाज का, बेटो की रहती है प्रधानता, जानिए मकर संक्रांति का त्योहार बस आने ही वाला है यह पूरे देश में बहुत ही धूम धाम से मनाया जाता है, तिल की मिठाईया बनाई जाती और सबको बाटी जाती है लेकिन भारत देश के बिहार शहर में मकर संक्रांति का खास महत्व है. मकर संक्रांति के दौरान बिहार में तिलकट भरने की परंपरा सदियों से चली आ रही है और इस दौरान सभी माता अपने पुत्रों के द्वारा तिल, गुड़ और चावल देकर उनसे वचन लेती है.

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लेकिन मकर संक्रांति की यह एक परंपरा है, जिसमे बेटियों को अलग रखा जाता है. घर की बेटियों को इस परंपरा में ना तो शामिल किया जाता है और ना हीं उन्हें इस परंपरा का हिस्सा बनाया जाता है.वास्तव मे मकर संक्रांति के दौरान माताएं अपने बेटों के हाथ में तिल, गुड़ और चावल देती हैं और उनसे वह वचन लेती है कि वह बुढ़ापे में उनका सहारा बनेंगे उनका ख्याल रखेंगे अचरज बात यह कि इस परंपरा में घर की बेटियों की महत्वता नहीं है न कि बेटिओ का कोई योगदान है.

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बेटा होता है कुल का दीपक

बेटियों को इस तिलकुट परंपरा से दूर रखा जाता है बिहार शहर मे मकर संक्रांति के दिन घर में तिलकट भरने की परंपरा होती है और इस दिन घर के कुल देवता पर तिल गुड़ और चावल चढ़ाया जाता है. फिर यही प्रसाद माता अपने बेटे और बहू के साथ तो इस परंपरा को पूरा करती हैं जबकि बेटियों के हाथ में तिल और चावल नहीं दिया जाता है पर बेटियों को इस परम्परा से दूर रखा जाता है.

बेटियों को शामिल नहीं करने का यह है कारण

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ऐसी मान्यता है की बेटियां तो शादी करके दूसरे घर चली जाती है और माता पिता को बेटे के साथ ही साडी ज़िन्दगी रहना होता है बेटे पूरे उम्र अपने माता-पिता के साथ रहते हैं इसी कारण इस शुभ दिन अपने कुल देवता को तिल, गुड़ और चावल चढ़ाने के बाद उनका प्रसाद माताएं अपने बेटों के हाथ में देती है और उनसे बुढ़ापे में उनका सहारा बनने का वचन लेती है.और इस परम्परा से बेटिओं को दूर रखते है बेटियां इस परंपरा को अपने ससुराल में पूरा करती है, और यही कारण है कि बेटियों को इस परंपरा से दूर रखा जाता है.

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