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Tuesday, February 7, 2023
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पुतिन और प्रिंस सलमान ने नाटो पर मचाया कहर, तेल की धार में बुरे फंसे बाइडन! 122 बैरल प्रति डॉलर हुआ तेल

Opec Crude Oil Prodcution Cut: पुतिन और प्रिंस सलमान ने नाटो पर मचाया कहर, तेल की धार में बुरे फंसे बाइडन! 122 बैरल प्रति डॉलर हुआ तेल तेल निर्यातक देशों ने कच्चे तेल के उत्पादन में बीस लाख बैरल प्रतिदिन की कटौती कर दी है। इसके बाद यूरोप और अमेरिका में खलबली मच गई है। इस बार की सर्दी भारी पड़ने वाली है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन को लग रहा था कि उनका जुलाई में सऊदी अरब जाना काम कर जाएगा और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान तेल सप्लाई बढ़ाएंगे। लेकिन व्लादिमीर पुतिन और मोहम्मद बिन सलमान की दोस्ती ने नाटो का सारा खेल बिगाड़ दिया।

Opec Crude Oil Prodcution Cut

अब हर दिन बीस लाख बैरल की सप्लाई रोकने के फैसले से अमेरिका बिलबिला रहा है। ऐसी कटौती मार्च, 2020 के बाद पहली बार हुई है। तब कोरोनावायरस के कहर से वर्ल्ड इकॉनमी की रफ्तार थम गई थी। लिहाजा तेल की डिमांड ही नहीं थी। जब कोरोना से आगे निकली दुनिया तो रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया। और ग्लोबल सप्लाई चेन बिगड़ गया। यूरोप-अमेरिका ने रूस को सबक सिखाने के लिए छह किस्तों में प्रितबंध का पैकेज पेश कर दिया। तेल के दाम उछल कर 122 बैरल प्रति डॉलर तक पहुंच गए। दुनिया में महंगाई चरम पर पहुंचने लगी। हमने भी 100 रुपए लीटर पेट्रोल लेना शुरू कर दिया।

कच्चे तेल की धमकी

कच्चे तेल की धमकी सामरिक दृष्टिकोण से भले पुतिन पर दबाव बना हो, आर्थिक तौर पर क्रेमलिन कमजोर नहीं पड़ सका। इसके उलट जिंदा रहने के लिए जरूरी गैस -तेल नाटो के देश ही रूस से लेते रहे। अमेरिका ने यूरोप को ताना देने के बदले भारत-चीन को धमकाना शुरू कर दिया तो हमने साफ बता दिया कि हमें खुद पेट्रोल-डीजल की चिंता है तो हम रूस से ही ज्यादा तेल खरीद लेंगे। मजबूरी में अमेरिका ने यूरोप को मनाया कि खुद ही खपत कम कर दो। बिजली कटौती कर लो, ऑफिस में जल्दी छुट्टी कर दो लेकिन रूस की कमाई पर रोक लगा दो। नाटो ने भारत के साथ इमोशनल कार्ड भी खेला। ये बताकर कि रूस से तेल लेने का मतलब है पुतिन के वॉर मशीन को चलाना क्योंकि रूस उन्हीं पैसों से जंग लड़ रहा है। ये देख कर भारत में दाल नहीं गल रही, नाटो ने तय किया था प्रतिबंधों की सातवीं किस्त नवंबर से लागू की जाए। इसके तहत रूस से तेल सप्लाई पर निर्भरता को कम करना था।

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अमेरिका ने ओपेक से विनती की थी कि सप्लाई न घटाए

अमेरिका ने ओपेक से विनती की थी कि सप्लाई न घटाए, लेकिन सऊदी अरब और रूस ने खेल कर दिया। पहले ही ग्बोलल सप्लाई दो परसेंट गिरा दी। लिहाजा तेल के दाम अब फिर से ऊपर जा सकते हैं। फिर महंगाई कहां जाएगी, जरा सोच लीजिए। इंग्लैंड में ये 40 साल के सर्वोच्च स्तर पर है। अमेरिका ने ओपेक से विनती की थी कि सप्लाई न घटाए। अब घटने के बाद जो बाइडन के प्रवक्ता ने से अदूरदर्शी फैसला बताया है। इंग्लैंड के पूर्व पीएम बोरिस जॉनसन ने भी सऊदी अरब से विनती की थी कि लेकिन कोई असर नहीं पड़ा। हमें बीच में पड़ने की जरूरत नहीं है। मोदी सरकार तेल की धार और चाल दोनों समझ रही है। तभी तो रूस हमारा नंबर वन क्रूड ऑयल सप्लायर बन गया है। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक सितंबर में रूस से तेल का आयात 19 परसेंट बढ़ा है। अब सऊदी अरब से भी ज्यादा तेल हम रूस से खरीद रहे हैं। और डंके की चोट पर इसे और बढ़ाने का भी ऐलान कर चुके हैं। जाने अमेरिका, जाने यूरोप। किसी भी मिलट्री अलायंस के लिए हम अपने हितों की आहुति नहीं दे सकते। ताजा आंकड़ों के मुताबिक रूस का आधा तेल तो सिर्फ भारत और चीन खरीद रहे हैं।

​​मोदी-सलमान की यारी

​​मोदी-सलमान की यारी जुलाई में जो बाइडन खुद बड़े अरमान लेकर सऊदी अरब पहुंच गए थे। ये यात्रा काफी विवादों में रही। कभी सऊदी अरब का कान ऐंठने की सोच रहे जो बाइडन महंगाई की गर्मी शांत करने की उम्मीद से रियाद पहुंचे थे। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने एयरपोर्ट जाकर बाइडन का स्वागत करने से इनकार कर दिया। जब बाइडन ने इंस्ताबुल में सऊदी पत्रकार जमाल खाशोगी के मर्डर का मुद्दा उठाया तो एमबीएस ने अबू गरीब की याद दिला दी। चलते-चलते बाइडन ने अनुरोध किया कि तेल की सप्लाई बढ़ा दो जिससे रूस से आयात रोकने का असर दूर किया जाए। लेकिन ऐसा नहीं हो सका।

भारत के साथ सऊदी अरब के रिश्ते हुए गहरे

भारत के साथ सऊदी अरब के रिश्ते हुए गहरे इधर भारत के साथ सऊदी अरब के रिश्ते इतने गहरे हो चुके हैं उसके सबसे बड़े कर्जदार पाकिस्तान को भी दर्द हो रहा है। शुरुआत तो 2006 में किंग अब्दुल्ला के दिल्ली दौरे से हो गई थी लेकिन नरेंद्र मोदी ने इसे दूर तलक ले गए हैं। 2016 में किंग सलमान ने मोदी को सऊदी अरब का सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया। फिर 2019 में एमबीएस दिल्ली आए और भारत में 100 अरब डॉलर के निवेश का एलान किया। इसी साल अक्टूबर में मोदी जब रियाद पहुंचे तो एमबीएस ने गर्मजोशी से उनका स्वागत किया। दोनों देशों ने ऐतिहासिक स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप काउंसिल बनाने के समझौते पर दस्तखत किए। एमबीएस को भी पता है कि उनके देश में मौजूद 22 लाख भारतीय वहां के विकास में क्या भूमिका निभाते हैं। इसलिए ओपेक के फैसले से भारत पर खास असर नहीं पड़ना चाहिए। रूस के साथ हमारी ऑयल डील ब्रेंट क्रूड के मुकाबले 20 से 30 परसेंट सस्ता है।

​​OPEC Plus में कौन-कौन​ से देश है शामिल

​​OPEC Plus में कौन-कौन​ से देश है शामिल ,ओपेक अभी 13 देशों का संगठन है – सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ईरान, इराक, कुवैत, अल्जीरिया, लीबिया, नाइजीरिया, कॉंगो, अंगोला, गैबों, गिनी, वेनेजुएला और इक्वाडोर। इसमें 10 देशों को और जोड़ कर बना है ओपेक प्लस। ये हैं – रूस, अजरबैजान, बहरीन, ब्रुनेई, कजाकिस्तान, मलेशिया, मैक्सिको, ओमान, दक्षिणी सूडान और सूडान। तो कुल मिलाकर हुए 23 तेल उत्पादक देश जिनके पास इकॉनमी के इंजन की चाबी है। 1960 में बगदाद कॉन्फ्रेंस के बाद ओपेक की नींव पड़ी थी। तब इसमें इराक, ईरान, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला साथ आए थे। दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला को छोड़ बाकी खाड़ी के देश ही थे। मकसद था वर्ल्ड ऑयल मार्केट में तेल की सप्लाई पर कंट्रोल। और इकॉनमी में किसी भी सामान का दाम आपूर्ति पर भी निर्भर करता है, इसलिए परोक्ष रूप से दाम पर भी कंट्रोल करना इसका मकसद बना। ओपेक का मुख्यालय ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में है। कोई भी तेल निर्यातक देश इसका सदस्य बन सकता है।

​तेल बाजार पर किसका दखल​

तेल बाजार पर किसका दखल​, फिलहाल दुनिया के कुल कच्चे तेल का 30 परसेंट ओपेक निकालता है। इसमें सबसे बड़ा उत्पादक सऊदी अरब है। यहां के कुएं हर दिन एक करोड़ बैरल कच्चा तेल उगलते हैं। 2016 में जब क्रूड ऑयल के दाम बहुत घट गए तब ओपेक प्लस का आइडिया सामने आया। जिन दस नए देशों को जोड़ा गया उनमें रूस भी सऊदी अरब के बराबर हर दिन एक करोड़ बैरल तेल का उत्पादन करता है। ओपेक प्लस बनने से कार्टेल की ताकत बढ़ चुकी है। अब दुनिया के 40 प्रतिशत तेल उत्पादन पर इनका कंट्रोल है। ये 23 देश अल्फ्रेड मार्शल के मांग-आपूर्ति सिद्धांत के मुताबिक दाम पर भी कंट्रोल करने में सक्षम हैं। ऐसा नहीं है कि अमेरिका खुद कच्चे तेल का उत्पादन नहीं करता। जो बाइडन का देश भी एक करोड़ बैरल से ज्यादा कच्चा तेल हर दिन निकालता है लेकिन इससे घरेलू जरूरत भी पूरी नहीं होती। फिर यूरोप और इसके नाटो वाले यारों को क्या ही मिलेगा। ऊपर से जर्मनी, ऑस्ट्रिया, हंगरी जैसे देश हाड़ कंपाने वाली ठंड से बचने के लिए जो हीटर चलाते हैं उसका गैस रूस देता है। और रूस से यूरोप को जाने वाली गैस पाइपलाइन नॉर्ड का नॉब व्लादिमीर पुतिन ही घुमा सकते हैं।

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